Aaj Ki Baat !

भूखे भक्त (लघु कथा)
कई दिन से ‘भक्त’ बहुत परेशान थे उन्हें उनका मन पसंद का भौजन मिले काफी समय गुजर गया था, यह भोजन किसी हांडी में नहीं बनता बल्कि ये दंगों की चाश्नी में लिपटा हुआ होता है, जिसमें मासूमों का खून, और महिलाओं के चीखने चिल्लाने की आवाज भी शामिल होती हैं, ये तथाकथित धर्माधिकारी भी उन धर्म के पुजारियों से अलग होते हैं जो किसी एकांतवास में पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर वासुधेव कुटुंबकुम का जाप करते हैं। मगर जिन्हें भूख लगी थी वे उनसे बिल्कुल अलग थे, उन्हें इससे मतलब नहीं था कि वासुधेव कुटुंबकुम क्या होता है ? उन्हें तो बस कुछ मासूमों का खून चाहिये, कुछ महिलाओं की जरूरत थी ताकि उनकी जिस्म की ज्वाला ठंडी हो सके, और तमाम उम्र फिर वे लोग वे उनके आतंक से सहमे हुऐ रहें । ये भक्त किसी भगवान रूपी दैवीय शक्ति के भी पुजारी नहीं थे बल्कि इन्होंने अपना भगवान तथाकथित धर्माधिकारी रूपी एक नेता को मान रखा था। वह था ही एसा जहां भी जाता अगले दिन वहां के भक्तों की भूख तो मिटती ही साथ ही चील, कौओं, गिद्धों, कुत्तों की भी भूख मिट जाती। कई दिन तक यह सिलसिला जारी रहता। आज भूखे भक्तों ने फिर उसी शख्स को बुलाया और उसने फिर अपने भाषण में खुद के भक्तों द्वारा किये गये अपने नरसंहार को दोहराया। मोहल्ले और गांव, बस्तियों, के लोग खौफजदा हैं, कहीं भूखे ‘भक्त’ उनकी बस्तियों की तरफ न आ जायें। 
नोट - इस कथा का तोगड़िया के बयान से मेल खाना संयोग माना जायेगा।

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